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नीमच। 'हम' की अपेक्षा अब 'स्व' को केंद्र में रखकर आचरण का अभ्यास करना होगा। भारत को सही मायने में उच्च शिखर पर ले जाना है तो अपनाना होगा- मैं बदलूंगा तो युग बदलेगा। इसके लिए कुरीतियों, विकृतियों का त्याग करना नितांत आवश्यक है। यह विचार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व अखिल भारतीय सर संघ चालक श्री सुरेश भैया जी जोशी ने नीमच के टाउन हॉल में आयोजित प्रमुख मातृशक्ति और प्रमुखजन गोष्ठी को संबोधित करते हुए कही।
प्रथम सत्र में भैया जी जोशी ने मातृशक्ति से संवाद किया। आपने महिलाओं से परिवार, सामाज, विभिन्न वर्गो, व्यवस्थाओं, आदिकाल की परंपराओं, रीतियों, कुरीतियों, रूढ़ियों और सुधार को लेकर विस्तृत चर्चा की। प्रबुद्ध महिलाओं ने विभिन्न बिंदुओं पर समाज मे समानता और सुधार की संभावनाओं पर विचार रखे।
द्वितीय सत्र में प्रमुखजन गोष्ठी का आयोजन हुआ जिसमें भारत की संस्कृति और सभ्यता को आगे बढ़ाने में अवरोध बन रही परिस्थितियों पर विस्तार से चर्चा की गई। समाज के विभिन्न वर्ग के प्रमुखजनों ने सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तन और सुधार के लिए महत्वपूर्ण सुझाव भी दिए।
पूर्व सर कार्यवाह भैया जी जोशी ने इन सत्रों में कहा कि भारत में हिंदू हैं लेकिन हिंदुत्व का अभाव दिखाई देता है। भारत मे रहकर भी भारतीय नहीं बन पा रहे हैं।
आज भी सामाजिक, जातिगत भेदभाव सबसे बड़ी चुनोती है। जन्म के आधार पर जब पृकृति ने कोई भेद नहीं किया तो हम ऊंच नीच, भेदभाव, स्पृश्य अस्पृश्यता जैसी कुप्रथाओं को क्यों ढो रहे हैं। आज तत्वज्ञान आचरण को जीवन और सिद्धांतों में लाने वाले हिंदुओ की आवश्यकता है। हिंदू की सही पहचान उसके जीवन मूल्यों से है। पुरातन काल की कुछ प्रथाएं आगे चलकर कुरीतियों और विकृति में बदल गई। उन्हें त्यागे बिना हम सुद्रढ़ राष्ट्र की कल्पना नहीं कर सकते। आधुनिकता को स्वीकार करें सदुपयोग करें लेकिन पाश्चात्य सभ्यता को जीवन का हिस्सा न बनने दें। पौराणिक काल मे नदियों, पेड़ पृकृति की पूजा की परंपरा रही, लेकिन अधिनिकता के दौर में हम इन्हें छोड़ते गए। दहेज प्रथा को आज भी चला रहे हैं। लड़की हमारी है तो यह अन्याय है और लड़का हमारा है तो यह परंपरा में ली गई। ऐसे ही ऊंच नीच का भेदभाव है। जबकि आज क्या उच्च जाति के घरों में निम्न मानसिकता के बच्चे पैदा नहीं होते क्या? यही नहीं कई निम्न परिवारों में उच्च मूल्यों वाली संतान पैदा होती है। भेदभाव को समाप्त किये बिना हम आगे बढ़ ही नहीं सकते। यानि जो छोड़ना था उन्हें अपनाए हुए हैं और जो अपनाना था उन्हें हम छोड़ क्यों रहे? अच्छी बातें पुस्तकों से नहीं अपितु माता पिता से मिलती है। पीढ़ी यदि संवरती है या बिगड़ती है तो दोष माता पिता का भी है। बच्चों को जो आवश्यक है वह देने वाले बनें न कि जो चाहिए वह दें। देशभक्ति केवल 15 अगस्त या 26 जनवरी को नहीं दिखाई देनी चाहिए। देशभक्ति का संबंध तो नित्य जीवन से है।
भैया जी ने कहा कि दुनिया मे भारत की दुर्लभ परम्पराओं, संस्कृति, समाज और परिवार व्यवस्था का कोई सानी नहीं है। लेकिन इसे न केवल समझना होगा बल्कि जीवन मे अनुसरण भी दृढ़ता से करना होगा। तब हम विश्व के मार्गदर्शक बनने की स्थिति में होंगे। हम किसी की पराजय में विश्वास नहीं करते बल्कि उनको जीतने में हमारा विश्वास है। सनातन हिन्दू धर्म के मूल्यों को समझकर आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। हम हिन्दू होकर भी हिंदू नहीं बन पा रहे। स्वयं की भूमिका का निर्धारण कीजिये तब भारतको विश्वगुरू बनाने का सपना साकार होगा।
दोनों ही सत्रों में विभिन्न वर्गों के प्रमुखजन और प्रमुख मातृशक्ति से भैया जी जोशी ने विस्तृत संवाद किया। आरंभ मां भारती के चित्र पर माल्यार्पण और प्रेरक गीत से हुआ। मंच पर भैया जी जोशी के साथ विभाग कार्यवाह श्री सतीश खंडेलवाल, जिला कार्यवाह श्री अनिल जैन आसीन थे। कार्यक्रम में संघ के प्रांत, विभाग, जिला, नगर पदाधिकारी मौजूद रहे।