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MP न्यूज़
फर्जी बोर्ड की 95 प्रतिशत मार्कशीट से सरकारी नौकरी :: - एमपी बोर्ड में फेल अभ्यर्थी बने टॉपर, यूपी और राजस्थान के अस्तित्वहीन बोर्डों की अंकसूचियों से हासिल की नियुक्तियां
📅 18 Oct, 2026
📰 पूरी खबर:
- शिवपुरी में 7 सहायिकाएं हटाईं, दतिया में भी संदिग्ध नियुक्तियां निरस्त
- भोपाल । मध्यप्रदेश में सरकारी नौकरियों में चयन के लिए फर्जी अंकसूचियों के इस्तेमाल का ऐसा खेल सामने आया है, जिसमें असली परीक्षा में असफल अभ्यर्थी दूसरे राज्यों के कथित बोर्डों की मार्कशीट पर 90 से 95 प्रतिशत तक अंक हासिल कर नौकरी पाने में सफल हो गए। ग्वालियर-चंबल अंचल के दतिया और शिवपुरी में सामने आए दो मामलों ने भर्ती प्रक्रिया में दस्तावेजों के सत्यापन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। दोनों मामलों में जिन बोर्डों की अंकसूचियों के आधार पर नियुक्तियां हुईं, जांच में उनका अस्तित्व ही संदिग्ध पाया गया।
दतिया में उत्तर प्रदेश के महर्षि वाल्मीकि संस्कृत एवं योग शिक्षा संस्थान की अंकसूचियों से नियुक्तियां हासिल करने का मामला सामने आया, जबकि शिवपुरी में राजस्थान के कथित मुक्त विद्यालय शिक्षा परिषद, सूरतगढ़ की मार्कशीट के आधार पर आंगनबाड़ी सहायिका की नौकरी पाने का खुलासा हुआ। दोनों मामलों में फर्जी वेबसाइट, संदिग्ध पते और अंकसूचियों की विश्वसनीयता को लेकर एक जैसा पैटर्न सामने आया है। कार्रवाई के नाम पर अब तक नियुक्तियां निरस्त करने और संबंधित महिलाओं को नौकरी से हटाने तक कदम उठाए गए हैं। लेकिन कथित फर्जी बोर्डों के संचालकों, मार्कशीट उपलब्ध कराने वालों और स्थानीय स्तर पर सक्रिय संभावित बिचौलियों तक जांच पहुंचने का इंतजार है। खास बात यह है कि शिवपुरी के मामले में अब तक एफआईआर दर्ज नहीं होने की जानकारी सामने आई है।
एमपी बोर्ड में फेल, दूसरी मार्कशीट में 95 प्रतिशत अंक
शिवपुरी जिले के पोहरी क्षेत्र के अमरगढ़ में संजना यादव का आंगनबाड़ी सहायिका पद पर चयन हुआ था। नियुक्ति के लिए प्रस्तुत 12वीं की अंकसूची राजस्थान के मुक्त विद्यालय शिक्षा परिषद, सूरतगढ़ के नाम से जारी बताई गई थी। इसमें 95 प्रतिशत अंक दर्शाए गए थे। जांच में सामने आया कि संबंधित अभ्यर्थी उसी वर्ष मध्यप्रदेश माध्यमिक शिक्षा मंडल की नियमित परीक्षा में फेल हुई थी। इसी तरह शिवपुरी में रचना धाकड़ की 90.8 प्रतिशत अंक वाली अंकसूची पर संदेह होने के बाद सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगी गई। राजस्थान के शिक्षा विभाग की जांच और मुख्य ब्लॉक शिक्षा अधिकारी, सूरतगढ़ की 15 जून 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, मुक्त विद्यालय शिक्षा परिषद नाम की कोई संस्था या बोर्ड वहां अस्तित्व में नहीं मिला। जांच में अंकसूचियों को फर्जी पाए जाने के बाद विभागीय स्तर पर कार्रवाई की गई। संजना यादव को नौकरी से हटाया गया, जबकि जुलाई में छह अन्य सहायिकाओं की नियुक्तियां भी समाप्त की गईं। इस तरह शिवपुरी में कुल सात सहायिकाओं पर कार्रवाई हुई।
दतिया में 718 अंक वाली मार्कशीट पर सवाल
दतिया में भी इसी तरह का मामला सामने आया। जनपद सदस्य के पति और अधिवक्ता छोटू गौतम की शिकायत पर एसटीएफ के एआईजी नवीन कुमार चौधरी के निर्देश के बाद कलेक्टर ने जांच दल गठित किया था। जांच में महर्षि वाल्मीकि संस्कृत एवं योग शिक्षा संस्थान, उन्नाव/लखनऊ के नाम से प्रस्तुत 12वीं की अंकसूचियां फर्जी पाई गईं। इन अंकसूचियों के आधार पर हासिल की गई संदिग्ध नियुक्तियों को निरस्त कर दिया गया। मामले में एक और गंभीर तथ्य सामने आया। वर्ष 2012 से 2022 तक की अंकसूचियों पर सचिव और परीक्षा नियंत्रक के हस्ताक्षर एक जैसे पाए गए। इससे अलग-अलग वर्षों में जारी दस्तावेजों की प्रामाणिकता पर सवाल उठे। जांच के दौरान कथित बोर्ड की वेबसाइट पर दर्ज मोबाइल नंबर भी दतिया के एक युवक से जुड़ा मिला। इससे स्थानीय स्तर पर संभावित संपर्कों और बिचौलियों की भूमिका की जांच की जरूरत सामने आती है।
फर्जी वेबसाइट, संदिग्ध पते और स्थानीय संपर्क
दोनों जिलों में सामने आए मामलों में कुछ समानताएं जांच के दायरे को व्यापक बनाने की मांग करती हैं। राजस्थान के सूरतगढ़ और उत्तर प्रदेश के उन्नाव-लखनऊ के पते पर दर्शाए गए कथित बोर्डों की वास्तविक मौजूदगी की पुष्टि नहीं हुई। मध्यप्रदेश बोर्ड की परीक्षा में असफल अभ्यर्थियों की दूसरी अंकसूचियों में 90 से 95 प्रतिशत तक अंक दर्ज होने से दस्तावेजों पर संदेह गहराया। कथित बोर्डों के ऑनलाइन विवरण और अंकसूचियों पर हस्ताक्षरों की जांच में अनियमितताएं सामने आईं। दतिया में वेबसाइट पर दर्ज मोबाइल नंबर स्थानीय युवक का होने से यह जांच जरूरी हो गई है कि अंकसूचियां किस माध्यम से अभ्यर्थियों तक पहुंचीं। इन तथ्यों के आधार पर संभावित नेटवर्क की भूमिका की जांच जरूरी है। हालांकि, दोनों मामलों के बीच किसी संगठित गिरोह का सीधा संबंध अभी जांच से प्रमाणित होना बाकी है।
नौकरी से हटाना पर्याप्त या जारी होगी आपराधिक जांच
मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि फर्जी अंकसूचियों के आधार पर नियुक्तियां हासिल करने वालों पर विभागीय कार्रवाई के बाद दस्तावेज तैयार करने और उपलब्ध कराने वालों के खिलाफ क्या कदम उठाए जाएंगे। महिला एवं बाल विकास विभाग के जिला कार्यक्रम अधिकारी धीरेंद्र जादौन के अनुसार, सत्यापन के बाद दोबारा जांच में अंकसूचियां फर्जी पाई गईं और परियोजना अधिकारी स्तर पर कार्रवाई की गई। उन्होंने बताया कि मामला उनके स्तर पर नहीं आया था, इसलिए एफआईआर दर्ज नहीं हुई। एसडीएम और परियोजना स्तर पर एफआईआर को लेकर निर्णय लिया जाएगा। विभाग की ओर से फिलहाल नियुक्तियां निरस्त करने की कार्रवाई की गई है। यह स्थिति प्रशासनिक कार्रवाई और आपराधिक जांच के बीच अंतर को उजागर करती है। यदि अंकसूचियां फर्जी थीं, तो उनकी उत्पत्ति, उन्हें जारी करने वाले लोगों, वेबसाइट संचालित करने वालों और भर्ती प्रक्रिया में उनकी स्वीकार्यता की जांच महत्वपूर्ण होगी।
सत्यापन व्यवस्था पर भी उठे सवाल
दतिया और शिवपुरी के मामले यह सवाल खड़ा करते हैं कि सरकारी नियुक्तियों में शैक्षणिक दस्तावेजों का सत्यापन किस स्तर पर और किस आधार पर किया गया। यदि किसी अभ्यर्थी की अंकसूची ऐसे बोर्ड के नाम पर प्रस्तुत हुई, जिसका अस्तित्व ही प्रमाणित नहीं हो सका, तो नियुक्ति से पहले संबंधित संस्था की मान्यता और रिकॉर्ड की जांच क्यों नहीं हुई? अब जरूरत केवल संदिग्ध नियुक्तियों को निरस्त करने तक सीमित रहने की नहीं, बल्कि दस्तावेजों के सत्यापन की पूरी प्रक्रिया की समीक्षा करने की है। साथ ही, दोनों मामलों में दर्ज तथ्यों और संभावित संपर्कों की कडिय़ों की जांच कर यह पता लगाना जरूरी है कि फर्जी अंकसूचियां व्यक्तिगत स्तर पर तैयार की गईं या इनके पीछे कोई व्यापक नेटवर्क काम कर रहा था। सबसे बड़ा सवाल यही है कि फर्जी मार्कशीट से नौकरी पाने वालों को हटाने के बाद उन्हें ये अंकसूचियां उपलब्ध कराने वालों तक जांच कब पहुंचेगी? जब तक इस सवाल का जवाब नहीं मिलता, तब तक सरकारी भर्तियों में दस्तावेजों की विश्वसनीयता और सत्यापन व्यवस्था पर संदेह बना रहेगा।
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