जबलपुर। म.प्र. उच्च न्यायालय के न्यायाधीश विशाल धगट व न्यायाधीश अनुराधा शुक्ला की संयुक्तपीठ ने एक मामले म ें कहा कि 13 साल से एक ही छत के नीचे रहते हुए पति-पत्नी में भावनात्मक संबंध पूरी तरह से खत्म हो जाने और आपस में प्रेम और विश्वास की जगह केवल नफरत और क्रूरता ेशेष रह जाने पर विवाह को खींचना दोनों पक्षों के साथ अन्याय है,। इस मत के साथ न्यायालय ने पति-पत्नी के विवाह को शून्य घोषित करते निचली अदालत के आदेश को बदलकर तलाक की मंजूरी दे दी। प्रकरण के मुताबिक अनूपपुर में रहने वाले शैलेंद्र ने उच्च न्यायालय में अपील दायर करते हुए कहा कि श्वेता से उसका वर्ष 2001 में प्रम विवाह हुआ था। इस शादी के कुछ सालों बाद ही पत्नी का व्यवहार बदल गया। अपील में उल्लेख किया गया कि इसके बाद 2011 से दोनों एक ही मकान में रह तो रहे हैं, लेकिन दोनों के बीच भावनात्मक संबंध पूरी तरह से खत्म हो गया है। श्वेता से तलाक लेने शैलेंद्र ने निचली अदालत में मुकदमा दाखिल किया, लेकिन उसे खारिज कर दिया गया। इस पर उच्च न्यायालय की शरण ली गई। रिकॉर्ड और गवाहों के बयान के आधार पर न्यायालय ने कहा कि विवाद की आग में दोनों पक्षों ने मर्यादा की सीमा लांघी थी। एक दूसरे पर अनैतिक संबंधों के आरोप भी लगाए। दोनों के बीच असंसदीय भाषा में बातें की जाती थी। एक घर में अलग-अलग मंजिलों पर रह रहे। दोनों के बीच आपसी विश्वास इस कदर खत्म हो चुका था कि अब वापसी का कोई रास्ता नहीं बचा था। संयुक्तपीठ ने लव मैरिज करने के बाद भी अलग-अलग रह रहे पति-पत्नी को इस मत के साथ तलाक की मंजूरी दे दी कि कानून को मानवीय पक्ष भी देखना चाहिए, एक विवाह जो पूरी तरह से मृत हो चुका है और एक दशक से दोनों के बीच वापसी की कोई संभावना भी नहीं बची है। सुनवाई के दौरान संयुक्तपीठ ने यह भी कहा कि ऐसे विवाह को कागजों पर जीवित रखना समाज और व्यक्ति दोनों के लिए घातक है। इसके साथ न्यायालय ने कोतमा की जिला अदालत के फैसले को पलटते हुए दोनों की शादी को 23 साल बाद कानूनी रूप से शून्य घोषित कर दिया है।